Tuesday, December 29, 2009

माँ



एक बेटे ने अपनी आत्मकथा में अपनी माँ के बारे में लिखा ;कि उसकी माँ की केवल एक आँख थी

इस कारण वह उस से नफ़रत करता था एक दिन उसके एक दोस्त ने उस से आ कर कहा कि अरे
तुम्हारी माँ कैसी दिखती है ना एक ही आँख में ? यह सुन कर वो शर्म से जैसे
ज़मीन में धंस गया दिल किया यहाँ से कही भाग जाए , छिप जाए और उस दिन उसने अपनी
माँ से कहा की यदि वो चाहती है की दुनिया में मेरी कोई हँसी ना उड़ाए तो वो यहाँ से चली जाए!
माँ ने कोई उतर नही दिया वह इतना गुस्से में था कि एक पल को भी नही सोचा की उसने माँ से क्या कह दिया हैऔर यह सुन कर उस पर क्या गुज़री होगी !कुछ समय बाद उसकी पढ़ाई खत्म हो गयी ,अच्छी नौकरी लग गई और उसने ने शादी कर ली ,एक घर भी खरीद लिया फिर उस के बच्चे भी हुए !एक दिन माँ का दिल नही माना वो सब खबर तो रखती थी अपने बेटे के बारे में और वो उन से मिलने को चली गयी उस के पोता पोती उसको देख के पहले डर गए फिर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे बेटा यह देख के चिल्लाया की तुमने कैसे हिम्मत की यहाँ आने की मेरे बच्चो को डराने की और वहाँ से जाने को कहा
माँ ने कहा की शायद मैं ग़लत पते पर आ गई हूँ मुझे अफ़सोस है और वो यह कह के वहाँ से चली गयी!
एक दिन पुराने स्कूल से पुनर्मिलान समरोह का एक पत्र आया बेटे ने सोचा की चलो सब से मिल के आते हैं !वो गया सबसे मिला ,यूँ ही जिज्ञासा हुई कि देखूं माँ है की नही अब भी पुराने घर में
वो वहाँ गया ..वहाँ जाने पर पता चला की अभी कुछ दिन पहले ही उसकी माँ का देहांत हो गया है
यह सुन के भी बेटे की आँख से एक भी आँसू नही टपका तभी एक पड़ोसी ने कहा की वो एक पत्र दे गयी है तुम्हारे लिए .....पत्र में माँ ने लिखा था कि ""मेरे प्यारे बेटे मैं हमेशा तुम्हारे बारे में ही सोचा करती थी और सदा तुम कैसे हो? कहाँ हो ?यह पता लगाती रहती थी उस दिन मैं तुम्हारे घर में तुम्हारे बच्चो को डराने नही आई थी बस रोक नही पाई उन्हे देखने से इस लिए आ गयी थी, मुझे बहुत दुख है की मेरे कारण तुम्हे हमेशा ही एक हीन भावना रही पर इस के बारे में मैं तुम्हे एक बात बताना चाहती हूँ की जब तुम बहुत छोटे थे तो तुम्हारी एक आँख एक दुर्घटना में चली गयी अब मै माँ होने के नाते कैसे सहन करती कि मेरा बेटा अंधेरे में रहे इस लिए मैने अपनी एक आँख तुम्हे दे दी और हमेशा यह सोच के गर्व महसूस करती रही की अब मैं अपने बेटे की आँख से दुनिया देखूँगी और मेरा बेटा अब पूरी दुनिया देख पाएगा उसके जीवन में अंधेरा नही रहेगा
 ..सस्नेह
तुम्हारी माँ """


Monday, December 21, 2009

मेरा आखिरी सफर है


बस काफी भर चुकी थी। पर अभी भी एक सीट खाली पड़ी थी। कई सवारियों ने वहाँ बैठना चाहा, पर साथ बैठा बुजुर्ग ‘सवारी बैठी है’ कहकर सिर हिला देता। बुजुर्ग ने वहाँ एक झोला रखा हुआ था।

बस चलने तक किसी ने वहाँ बैठने की ज़िद न की। लेकिन जब बस चल पड़ी, तब कुछेक ने बैठने की ज़िद पकड़ ली।
बुज़ुर्ग का एक ही जवाब था कि ‘सवारी बैठी है।’ जब कोई पूछता कि सवारी कहाँ है, तो वह झोले की तरफ इशारा कर देता। असली बात का किसी को पता नहीं लग रहा था।
कुछ सवारियाँ अनाप–शनाप बोलने लगीं, बैठे हुए कुछ लोगों ने खाली सीट पर सवारी बैठाने की बुज़ुर्ग से विनती की। बुज़ुर्ग ने फिर वही शब्द ‘सवारी बैठी है’ दोहरा दिए।
बात बढ़ गई थी। सवारियों ने ज़बर्दस्ती बैठने की कोशिश की, पर बुजुर्ग ने उन्हें आराम से मना कर दिया। वह कहीं गहरे में डूबा था। हारकर सवारियों ने कंडक्टर को सारी बात बताई।
बुजुर्ग ने ढीले हाथों से जेब में से दो टिकट निकालकर कंडक्टर को पकड़ा दिए। आँसू पोंछते हुए उसने कहा, ‘‘दूसरा टिकट मेरे जीवन–साथी का है। वह अब इस दुनिया में नहीं रही। ये उसके फूल हैं......यह जीवनसाथी के साथ मेरा आखिरी सफर है।’’.....
 

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Saturday, December 19, 2009

ऊँचाई --------रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

पिताजी के अचानक आ धमकने से पत्नी तमतमा उठी, “लगता है बूढ़े को पैसों की ज़रूरत आ पड़ी है, वर्ना यहाँ कौन आने वाला था। अपने पेट का गड्‌ढा भरता नहीं, घर वालों का कुआँ कहाँ से भरोगे?”



मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखने लगा। पिताजी नल पर हाथ-मुँह धोकर सफर की थकान दूर कर रहे थे। इस बार मेरा हाथ कुछ ज्यादा ही तंग हो गया। बड़े बेटे का जूता मुँह बा चुका है। वह स्कूल जाने के वक्त रोज़ भुनभुनाता है। पत्नी के इलाज़ के लिए पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं। बाबू जी को भी अभी आना था।


घर में बोझिल चुप्पी पसरी हुई थी। खान खा चुकने पर पिताजी ने मुझे पास बैठने का इशारा किया। मैं शंकित था कि कोई आर्थिक समस्या लेकर आए होंगे। पिताजी कुर्सी पर उकड़ू बैठ गए। एकदम बेफिक्र, “सुनो” -कहकर उन्होंने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। मैं साँस रोककर उनके मुँह की ओर देखने लगा। रोम-रोम कान बनकर अगला वाक्य सुनने के लिए चौकन्ना था।


वे बोले, “खेती के काम में घड़ी भर की फ़ुर्सत नहीं मिलती है। इस बखत काम का जोर है। रात की गाड़ी से ही वापस जाऊँगा। तीन महीने से तुम्हारी कोई चिट्ठी तक नहीं मिली। जब तुम परेशान होते हो, तभी ऐसा करते हो।”


उन्होंने जेब से सौ-सौ के दस नोट निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिए- “रख लो। तुम्हारे काम आ जाएँगे। इस बार धान की फ़सल अच्छी हो गई है। घर में कोई दिक्कत नहीं है। तुम बहुत कमज़ोर लग रहे हो। ढंग से खाया-पिया करो। बहू का भी ध्यान रखो।”


मैं कुछ नहीं बोल पाया। शब्द जैसे मेरे हलक में फँसकर रह गए हों। मैं कुछ कहता इससे पूर्व ही पिताजी ने प्यार से डाँटा- “ले लो। बहुत बड़े हो गए हो क्या?”


“नहीं तो” - मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने नोट मेरी हथेली पर रख दिए। बरसों पहले पिताजी मुझे स्कूल भेजने के लिए इसी तरह हथेली पर इकन्नी टिका दिया करते थे, परन्तु तब मेरी नज़रें आज की तरह झुकी नहीं होती थीं।

Wednesday, November 25, 2009

रिश्ते का नामकरण.................. दलीप सिंह वासन






उजाड़–से रेलवे स्टेशन पर अकेली बैठी लड़की को मैंने पूछा तो उसने बताया कि वह अध्यापिका बन कर आई है। रात को स्टेशन पर ही रहेगी। प्रात: वहीं से ड्यूटी पर उपस्थित होगी। मैं गाँव में अध्यापक लगा हुआ था। पहले घट चुकी एक–दो घटनाओं के बारे में मैंने उसे जानकारी दी।

‘‘आपका रात को यहाँ ठहरना उचित नहीं है। आप मेरे साथ चलें, मैं किसी के घर में आपके ठहरने का प्रबन्ध कर देता हूं।

जब हम गाँव में से गुज़र रहे थे तो मैंने इशारा कर बताया ‘‘मैं इस चौबारे में रहता हूँ।’’ अटैची ज़मीन पर रख वह बोली, ‘‘थोड़ी देर आपके कमरे में ही ठहर जाते हैं। मैं हाथ–मुँह धोकर कपड़े बदल लूँगी।’’

बिना किसी वार्तालाप के हम दोनों कमरे में आ गए।

‘‘आपके साथ और कौन रहता है?’’

‘‘मैं अकेला ही रहता हूं।’’

‘‘बिस्तर तो दो लगे हुए हैं!’’

‘‘कभी–कभी मेरी माँ आ जाती है।’’

गुसलखाने में जाकर उसने मुँह–हाथ धोए। वस्त्र बदले। इस दौरान मैं दो कप चाय बना लाया।

‘‘आपने रसोई भी रखी हुई है?’’

‘‘यहाँ कौन–सा होटल है!’’

‘‘फिर तो मैं खाना भी यहीं खाऊँगी।’’

बातों–बातों में रात बहुत गुज़र गई थी और वह माँ वाले बिस्तर पर लेट भी गई थी।

मैं सोने का बहुत प्रयास कर रहा था, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। मैं कई बार उठ कर उसकी चारपाई तक गया था। उस पर हैरान था। मुझ में मर्द जाग रहा था। परंतु उसमें बसी औरत गहरी नींद सोई थी।

मैं सीढि़याँ चढ़कर छत पा जाकर टहलने लग गया। कुछ देर बाद वह भी छत पर आ गई और चुपचाप टहलने लग गई।

‘‘जाओ सो जाओ, सुबह आपने ड्यूटी पर हाजि़री देनी है।’’ मैंने कहा।

‘‘आप सोए नहीं?’’

‘‘मैं बहुत देर तक सोया रहा हूँ।’’

‘‘झूठ।’’

‘‘.......’’

वह बिल्कुल मेरे सामने आ खड़ी हुई, ‘‘अगर मैं आपकी छोटी बहन होती तो आपको उनींदे नहीं रहना था।’’

‘‘नहीं–नहीं, ऐसी कोई बात नहीं,’’ और मैंने उसके सिर पर हाथ फेर दिया
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एक और डर का जन्म---------जिंदर


उस मरियल–से क्लर्क ने जेब से महीने–भर का वेतन निकाल चारपाई पर रखा और सिरहाने के नीचे से लेनदारों की लिस्ट निकाली। जोड़–घटाव करने के बाद उसके पास सिर्फ़ पचास रुपए बचे थे। पचास रुपए के आगे खड़े पूरे इकतीस दिन! कमरे में वह अकेला था, पर बच्चों की जरूरतों और पत्नी की हसरतों की लिस्ट फिल्म की रील की भाँति उसकी आँखों के आगे तेजी से घूमने लगी। पत्नी की लिस्ट पर लकीर मारते हुए उसे थोड़ी पीड़ा हुई, पर उसको इस बात का अहसास था कि ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ था। शशि की अधघिसी पैंट ने उसका हाथ पकड़ लिया। लेकिन पप्पी के टूटे हुए बूट ने एक ही झटके से उसका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। अभी वह कोई फैसला नहीं कर पाया था कि पत्नी अंदर आ गई और पचास का नोट उठाकर बोली, ‘‘मुझे नहीं पता, ये तो मैं नहीं दूँगी।’’


‘‘मेरी बात तो सुन!’’

‘‘बिल्कुल नहीं।’’ पत्नी उसी रौ में बोली।

‘‘सर्दियाँ शुरू हो गई हैं और पप्पी....’’

‘‘पप्पी के बूट से ज्यादा जरूरी आपकी दवाई है।’’

आगे वह कुछ नहीं बोला। उसने गले में से उठती खाँसी को जबरन रोक लिया। कहीं उसे खाँसते देख, पत्नी डॉक्टर को बुलाने ही न चली जाए।
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सूखे पेड़ की हरी शाख -------जगदीश कश्यप

रेट तय कर वह रिक्शे में बैठ गया और सोचने लगा–- बेटे का सामना कैसे कर पाएगा। वह तो आना ही नहीं चाहता था पर रतन की माँ बोली थी–- "देखो तुम एक बाप हो। बेटे ने शादी के लिए हामी भर दी । शादी करने यहीं आएगा। मान लो वहीं घर बसाकर वह हमें भूल जाए, तब हमारा क्या होगा? सरिता तो पराए घर की है । एक न एक दिन तो उसकी शादी करनी पड़ेगी। कब तक वह नौकरी कर हमें पालती रहेगी? पूरे सत्ताइस साल की हो चुकी है।"


"उतरो साहब,यही फाइन रेस्टोरेण्ट है।" --उसे झटका–सा लगा। रिक्शे से उतर वह न्यॉन साइन–बोर्ड पढ़ने लगा। पहले नीले अक्षर, फिर लाल। धुंधलके में लकदिप रोशनी में उसने देखा कि लोग शीशे वाला दरवाज़ा धकेल कर अन्दर जा रहे थे ,तो कोई–कोई बाहर निकल रहा था। अपने सादे लिबास और सिर पर बंधे साफ़े को देख एकबारगी उसे ख़ुद पर शर्मिदगी हुई। उसे अचानक याद आया। वह कड़कता हुआ बोला था–- "मैं एक मामूली बाबू, कहाँ तक भुगतूँ इस हरामज़ादे की बदनामी? सारा दिन आवारागर्दी और पार्टी पॉलिटिक्स । क्या मैंने इसलिए पढ़ाया था इसे! जी.पी. फण्ड में अब बचा ही क्या है? निचोड़ दिया है मुझे दोनों लड़कियों की शादियों ने।"

तभी वह कार के हॉर्न से चौंक गया और हड़बड़ाकर एक ओर हट गया। कार में से एक युवक उतरा और उसने आँखों से चश्मा उतारा। बूढ़े आदमी को सामने खड़ा पाकर युवक के चेहरे पर कुछ उभर–सा आया। रतन ने अपनी जो फोटू भेजी थी उससे यह युवक कितना मिलता–जुलता लगता है। उसे फिर याद आया। उस दिन तो हद हो गई थी। पता नहीं कौन से झगड़े में रतन कमीज–पैण्ट फड़वा आया था और चेहरे पर ख़रौंचे साफ दीख रही थीं।

"निकल जा...अभी निकल मेरे घर से ! ख़ानदान की नाक कटवा दी इसने!" और उसने ज़ोर से एक लात मारी थी....

"पिताजी आप यहाँ... क्या माँ ने भेजा है?"

वह भौचक्का रह गया। रतन बड़े अदब से पिता को रेस्टोरेण्ट के भीतर ले गया और अपने केबिन में ले जाकर रिवॉल्विंग चेयर पर बैठा दिया–- "आप आराम से बैठो, पिताजी। देखो, आपके नालायक बेटे ने कितनी तरक्की की है! आने में तकलीफ़ तो नहीं हुई? मैं थोड़ा बिजी था, वरना ख़ुद आता।"

पिता के दिल में आया कि वह अपने सपूत के आगे गिरकर जार–जार रो पड़े।
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Monday, November 16, 2009

धन्य है यह देश...... पी.सी.गोदियाल


बहुत साल पहले चिरंजन पार्क नै दिल्ली में एक आफिस कम गोदाम खोलने के लिए मकान देख रहे थे ! एजेंट एक बंगाली परिवार के घर में ले गया, घर वालो ने जिसमे एक ६०-६५ साल की विरध महिला भी थी माकन का पिछला हिस्सा दिखाया ! वहा जब एक कमरे में हम गए तो कोने पर एक वृद्ध लेटा था ! हमने कहा कि हमें अगले महीने की पहली तारीख से मकान चाहिए , मगर यहाँ ये विरध है इन्हें आप .. मेरी बात बीच में ही काटते हुए घर का बेटा बोला... वो हो जाएगा, पाप्पा को कैंसर है और डाक्टर ने कहा है कि दो हफ्ते से ज्यादा नहीं जी............. उसके बात सुन मै हक्का बक्का रह गया, और मेरे मुख से निकला धन्य है यह देश...... बेटा मकान किराये पर देने के लिए डाक्टर की भविष्यबाणी के सही निकलने की दुआ कर रहा था !

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Saturday, November 14, 2009

एक गरीब और बेचारी मा को देखिये कैसे बच्चे को जीना सिखाती है...



साभार     Prakash Singh "Arsh"                                                
  रोटी के लिए


बच्चे की जिद

और वो बेबस लाचार माँ

उसे मारती है,

वो जानती है भूख का दर्द

मार के दर्द में

कहीं खो जायेगा

कुछ देर को ही सही

बच्चा रोते रोते

सो जायेगा ॥

http://prosingh.blogspot.com/search?updated-max=2009-08-24T07%3A56%3A00-07%3A00

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Saturday, October 10, 2009

अपराध बोध--समीर लाल 'समीर'




अगस्त की उमस भरी शाम। पीछे रेलवे क्वार्टर की सिगड़ियों से उठते कोयले के धुएँ की खुशबू पूरे माहौल मे भरी हुई थी। ये महक मुझे शुरू से बहुत भाती है।

हवा खाने के लिये मैं अपने दूसरी मंजिल के फ्लैट की पीछे वाली बालकनी में निकल आता हूँ। सिगरेट जलाते ही मेरी नज़र उन दो आँखों से टकरा जाती है, जो पिछवाड़े के क्वार्टर के आँगन से मुझे ही ताक रहीं थी। मैं चाह कर भी उसकी नज़रों से अपनी नजरें नही हटा पाया और एकटक उसे देखने लगा।

कितनी गहरी और बोलती हुई आँखें हैं। माथे पर अल्हड़ता से बिखरी जुल्फ़ें और पसीने से बेतरतीब हो गई वो सिंदुरी बिंदिया। एक पुरानी सी धानी रंग की सूती साड़ी मे लिपटी वो बला की खुबसूरत लग रही थी।

ऐसा नहीं कि मैंने पहले कभी उसे नहीं देखा मगर आज पहिली बार नज़रें चार हुईं थी। उसकी आँखों मे एक अजब सा प्रश्न चिन्ह और चेहरे पर आंतरिक वेदना की एक परत।

वो शायद सिगड़ी उठाने ही बाहर निकली थी। नज़रों के मिलते ही वो जड़वत जहाँ की तहाँ खड़ी रह गई। काँपते होंठ जैसे कुछ कह देने को आतुर और आँखें अपने भीतर छिपी असंख्य वेदनाओं का इज़हार करने को बेकरार।

एकाएक उँगलियों के बीच जलन से बिना पिये सिगरेट खत्म होने की तरफ जैसे ही ध्यान गया, हाथ जोर से झटक कर सिगरेट फेंकी। मेरी हालात देख वो बस धीरे से मुस्कराई। हमारी नज़रें फिर भी एक दूसरे को ही देखती रहीं। कब शाम ढल गई और अंधियारा घिर आया, पता ही नही लगा।

एकाएक उसके घर के दरवाजे पर उसके पति की दस्तक सुनते ही घबड़ा कर वो अंदर भाग गई। मै वहीं बालकनी मे कुर्सी खींच कर बैठ गया। मन अभी भी उसके आँगन मे ही विचर रहा था।

उसके घर से चिल्लाने की आवाज आ रही थी। शायद उसका पति पीकर नशे मे घर लौटा था।

वो चिल्ला रहा था.. स्स्साआली, दिन भर पड़ी पड़ी आराम करती रहती है और अब कह रही है अभी खाना बनने में समय लगेगा... वो बुरी बुरी गालियाँ बकता जाये और उसे बुरी कदर मारता जाये। उसके रोने की आवाज़ भी मेरे कानों को भेद रही थी।

न जाने वो कब तक उसे मारता और चिल्लाता रहा। मुझसे सहा ना गया। मैं उठकर भीतर चला आया, एक आत्मग्लानि का एहसास लिये कि मेरी वजह से बेचारी की क्या हालत हो रही है। न मैं बालकनी में निकलता, न उससे नज़रें टकराती और न ही खाना बनाने में उसे देर होती... मैं अपराधबोध से घिरता चला गया।

इस वाकये को दो हफ़्ते बीत गये हैं। आज फिर बहुत उमस है। शाम हो रही है, अभी अभी दफ़्तर से लौटा हूँ। कुछ ताजी हवा खाने का मन है लेकिन आज मैं घर की सामने वाली बालकनी मे आकर बैठ जाता हूँ।

उस रोज का सिगरेट से जलने का घाव तो भर गया है, मगर उसकी जलन और अपराधबोध, दोनों अब तक ताज़े हैं।

Friday, September 18, 2009

छटपटाहट (साभार -- शबनम शर्मा)

बच्चों का ड्राईंग का पीरियड था। आज मैंने कक्षा में उनसे ही कुछ सुनने की ठानी। कक्षा 2 के नन्हें विद्यार्थी, एकदम आईने की तरह साफ स्पष्ट। मैंने सवाल रखा। आज आप बताएँगे कि आपको क्या अच्छा नहीं लगता। किसी ने कहा पढ़ना, किसी ने कहा घिया की सब्जी तो किसी ने कहा सुबह स्कूल आना। नन्हा मनोज अपनी कुर्सी से उठकर मेरे पास आया और बोला, "मैम! मुझे पता क्या अच्छा नहीं लगता।" मैंने उसका गाल थपथपाते हुए पूछा, "हाँ, बोलो।" वह फफक-फफक कर रो पड़ा व बोला, "मेरी मम्मी ने मुझे बुआ के घर पढ़ने को रखा है और खुद 2-2 महीने नहीं आती। मुझे उनकी बहुत याद आती है। जब बुआ अपने बच्चों को अपने साथ सुलाती है, बाज़ार ले जाती है और फूफा जी उन्हें खिलौने दिलाते हैं, चूमते हैं और मुझे पढ़ने बिठा देते हैं। जब उनका बेटा कभी मेरी चीज़ें माँगता है तो छीनकर दे देते हैं।"




नन्हें से बालक के मुँह से उसकी व्यथा सुनकर मैं स्तब्ध रह गई कि कौन सी पढ़ाई कराने के लिए जीते जी ममता इतनी हलकी हो गई।

viruslover"Babapandit"

Wednesday, September 16, 2009

रिश्ते (शबनम शर्मा)

सामने वाले घर में राहुल की दादी की मृत्यु हो गई थी। राहुल की उम्र ५ वर्ष की है, नन्हा बालक हैरान सा सब कुछ देख रहा था। उसके पापा ने फोन उठाकर ढेरों फोन कर दिये। पापा बड़े व्यस्त नज़र आए। कुछ ही समय में घर लोगों से भर गया। वह सब कुछ एक कोने में खड़ा देखता रहा। दादी का दाह संस्कार होने के बाद नाश्ते-पानी के बाद सब उसके पापा को सांत्वना देने लगे। वो अपनी मासियों, मामों, ताई-चाची, बुआ सबसे मिलकर बतियाते रहे। ८-१० दिन तक कुछ मेहमान आए कुछ गये। तेहरवीं पर सब चले गये। राहुल के पापा आज उसके कमरे में आए। उन्हें राहुल का चेहरा बड़ा उतरा हुआ लगा। इतने दिनों से किसी ने उसकी सुध नहीं ली थी। नन्हा बालक पापा की गोद में बैठ गया।


“पापा अब दादी कब आएगी।” पापा ने कहा दादी दूर गई है बहुत दिनों में आएगी। फिर राहुल ने पूछा, “पापा जो हमारे घर दादी को देख-देखकर जोर-जोर से रो रहे थे और आपको चुप करा रहे थे, आप उन्हें मौसी, मामा, चाची, ताई, बुआ कह रहे थे, ये कौन-कौन होते हैं।” राहुल के पापा ने उसे सब रिश्तों का मतलब समझाया तो राहुल, पापा के गाल पर गाल सटाकर बोला, “पापा जब मैं मरूँगा तो कोई नहीं रोएगा मेरा तो कोई बहन-भाई भी नहीं है।” उसकी ये बात सुनकर राहुल के पापा ने उसे जोर से छाती से चिपटा लिया और कहा, “नहीं बेटा, नहीं ऐसा नहीं कहते।”

वायरस लवर ''बाबापंडित''

गोश्त की गंध (सुकेश साहनी ) साहित्य कुञ्ज से ली गयी

दरवाजा उसके बारह वर्षीय साले ने खोला और सहसा उसे अपने सामने देखकर वह ऐसे सिकुड़ गया जैसे उसके शरीर से एक मात्र नेकर भी खींच लिया गया हो। दरवाजे की ओट लेकर उसने अपने जीजा के भीतर आने के लिए रास्ता छोड़ दिया। वह अपने साले के इस उम्र में भी पिचके गालों और अस्थिपंजर-से शरीर को हैरानी से देखता रह गया।


भीतर जाते हुए उसकी नजर बदरंग दरवाजों और जगह-जगह से झड़ते प्लास्टर पर पड़ी और वह सोच में पड़ गया। अगले कमरे में पुराने जर्जर सोफे पर बैठे हुए उसे विचित्र अनुभूति हुई। उसे लगा बगल के कमरे के बीचोंबीच उसके सास -ससुर और पत्नी उसके अचानक आने से आतंकित होकर काँपते हुए कुछ फुसफुसा रहे हैं।

रसोई से स्टोव के जलने की आवाज आ रही थी। एकाएक ताजे गोश्त और खून की मिली जुली गंध उसके नथुनों में भर गई। वह उसे अपने मन का वहम समझता रहा पर जब सास ने खाना परोसा तो वह सन्न रह गया। सब्जी की प्लेटों में खून के बीच आदमी के गोश्त के बिल्कुल ताजा टुकड़े तैर रहे थे। बस, उसी क्षण उसकी समझ में सब कुछ आ गया। ससुर महोदय पूरी आस्तीन की कमीज पहनकर बैठे हुए थे, ताकि वह उनके हाथ से उतारे गए गोश्त रहित भाग को न देख सके। अपनी तरफ से उन्होंने शुरु से ही काफी होशियारी बरती थी। उन्होंने अपने गालों के भीतरी भाग से गोश्त उतरवाया था, पर ऐसा करने से गालों में पड़ गए गड्‌ढों को नहीं छिपा सके थे। सास भी बड़ी चालाकी से एक फटा-सा दुपट्टा ओढ़े बैठी थी ताकि कहाँ-कहाँ गोश्त उतारा गया है, समझ न सके। साला दीवार के सहारे सिर झुकाए उदास खड़ा था और अपनी ऊँची-ऊँची नेकर से झाँकती गोश्त रहित जाँघों को छिपाने का असफल प्रयास कर रहा था। उसकी पत्नी सब्जी की प्लेट में चम्मच चलाते हुए कुछ सोच रही थी।

“राकेश जी, लीजिए....लीजिए न!” अपने ससुर महोदय की आवाज उसके कानों में पड़ी।

“मैं आदमी का गोश्त नहीं खाता!!” प्लेट को परे धकेलते हुए उसने कहा। अपनी चोरी पकड़े जाने से उनके चेहरे सफेद पड़ गए थे।

“क्या हुआ आपको?....सब्जी तो शाही पनीर की है!”.....पत्नी ने विस्फारित नेत्रों से उसकी ओर देखते हुए कहा।

“बेटा, नाराज मत होओ....हम तुम्हारी खातिर में ज्यादा कुछ कर नहीं....” सास ने कहना चाहा।

“देखिए, मैं बिल्कुल नाराज नहीं हूँ।” उसने मुस्करा कर कहा, “मुझे दिल से अपना बेटा समझिए और अपना माँस परोसना बन्द कीजिए। जो खुद खाते हैं, वही खिलाइए। मैं खुशी-खुशी खा लूँगा।”

वे सब असमंजस की स्थिति में उसके सामने खड़े थे। तभी उसकी नजर अपने साले पर पड़ी । वह बहुत मीठी नजरों से सीधे उसकी ओर देख रहा था। सास-ससुर इस कदर अचंभित थे जैसे एकाएक किसी शेर ने उन्हें अपनी गिरफ़्त से आजाद कर दिया हो। पत्नी की आँखों से आँसू बह रहे थे। यह सब देखकर उसने सोचा....काश, ये गोश्त की गंध उसे बहुत पहले ही महसूस हो गई होती!

वायरस लवर ''बाबापंडित''

बूढ़े पिता का निश्तेज चेहरा

पिता को पत्र लिखे पंद्रह से भी अधिक दिन हो गए थे, किंतु अब तक उनका मनीऑर्डर नहीं आने से राजन पिता की इस सुस्ती पर मन-ही-मन कुढ़ रहा था।


“हुँह, कहते थे, बेटे तुम तनिक भी चिंता मत करना। चाहे जैसे भी हो, मैं तुम्हें पढ़ाऊँगा अवश्य ज़मीन-जायदाद बेचकर भी तुम्हारी पढ़ाई के लिए खर्च जुटाऊँगा। और हालत यह है कि, जेब खर्च के लिए भी पैसे भेजने में सिरदर्द कर रहे हैं।”

अन्यमनस्क-भाव से कमरे में ताला लगाकर जैसे ही वह मुड़ा सामने पोस्टमैन को देख उसकी बाँछें खिल गई। उसने झटपट मनीऑर्डर के रुपये लिये और प्रसन्नता से सीटी बजाता हुआ सड़क पर निकल आया।

मन-ही-मन उसने कार्यक्रम भी तय कर लिये। सबसे पहले तो ‘अनामिका‘ में भोजन करेगा। फिर शाम को दोस्तों के साथ रीजेन्ट चलेगा। संयोग से आज ही अमिताभ की फिल्म लगी है। ब्लैक में टिकट लेकर ही सही, लेकिन फिल्म वह आज ही देखेगा।

अचानक फुटपाथ पर एक कृशकाय मानव-आकृति को देखकर वह ठिठक गया। उसका पूरा शरीर हड्डियों का ढाँचा नजर आ रहा था। फुटपाथ पर बैठा वह बड़े जतन से ऊँगलियों पर हिसाब करता हुआ पैसे गिनने में व्यस्त था। किंतु राजन के पैरों के आहट मिलते ही वह सचेत हो गया और टकटकी लगाकर उसे ही देखने लगा। उससे आँखें मिलते ही राजन सिहर उठा। उसके पूरे शरीर में झुरझुरी-सी फैल गई।

उस दुर्बल आकृति से नजर फेरकर झटके से वह आगे बढ़ ही जाना चाहता था कि तभी उस व्यक्ति ने क्षीण स्वर में उसे आवाज़ लगायी- “बाबूजी..... बाबूजी.....।”

राजन प्रश्नवाचक दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए पूछ बैठा- “क्या है ?‘‘ “बाबूजी,’उसने दीनता से अपने मैले चिकट अंगोछे से मुड़ा-तुड़ा मनीऑर्डर फॉर्म निकाला और उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा- “बाबूजी, मेरा बेटा श्रीरामपुर में पढ़ता है, पिछले दिनों उसका पत्र आया है..... उसे पैसे की आवश्यकता है.... ये पैसे मैंने उसे भेजने के लिये जुगाड़ किये हैं.... जरा इस फारम को.....।”

आगे के शब्द को वह साफ-साफ नहीं सुन पाया। उसकी आँखों के आगे अपने बूढ़े पिता का निश्तेज चेहरा टंग गया था।





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वायरस लवर ''बाबापंडित''


एह कहानी साहित्य कुञ्ज से डॉ० यू० एस० आनन्द द्वारा लिखित है मैं उनका (लेखक) का धन्यवाद करता हूँ जो इस तरह के लड़को की आँखे खोल देने वाले साहित्य की रचना कर हैं

Wednesday, July 29, 2009

ऐड्स जानकारी ही बचाव है




एक ऐड्स पीड़ित व्यक्ति


ऐड्स क्या है ?



आज कल आम आदमी के अन्दर एक डर सा बन गया है की ये मत करो वोह मत करो वरना ऐड्स हो जाए गा .परन्तु क्या किसी ने जानने की कोसिस की है कि ऐड्स क्या है यह कोई अकेली बीमारी नही है



यह बहुत सी छोटी छोटी बिमारियों का एक समूह है जो आप के रोग प्रतिरोधक क्षमता को बहुत ही कम कर देता है और और आप बहुत बिमारियों से घिर जाते हैं अंत मैं आप कि मृत्यु होने पर ही आप का ऐड्स का अंत होता है






भारत मे १९९० के बाद ऐड्स का आकर सुरसा के मुह कि तरह बढ़ता ही जा रहा है तजा अनुमान के मुताबिक भारत मैं तक़रीबन 25 लाख के आस पास लोग इससे ग्रसित हैं जो रोजाना हजारों कि संख्या मैं बढता ही जा रहा है






ऐड्स फैलता है कैसे


1-ऐड्स सबसे ज्यादा फैलता है असुरक्षित सम्भोग के द्वारा .जब कोई व्यक्ति ऐड्स पीड़ित वेश्या या कोई अन्य महिला या पुरूष समलिंगी या जिगेलो (पुरूष वेश्या ) के संपर्क में


आता है तो ऐड्स के वायरस एक व्यक्ति के अंगो से होते हुए दुसरे व्यक्ति तक पहुँच जाता है और सुरु होती वायरस कालोनी के बनने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है

२.वायरस वाली माँ के स्तन पान से या जन्म लेने के समय पैदा हुए बच्चे के ऐड्स हो जाता है

३.संक्रमित व्यक्ति के साथ इस्तेमाल हुई सुई या आपरे सन में इस्तेमाल हुए औजारों से ऐड्स फैलता है

४.संक्रमित व्यक्ति का दान किया हुआ खून किसी व्यक्ति को देनें से उस व्यक्ति मैं ऐड्स फ़ैल जाता है


ऐड्स से बचाव

संयम और सुरक्षा ऐड्स से रक्षा ,कंडोम का प्रयोग करें ,एक पत्नी व्रत का पालन करें जहाँ तक सम्भव हो ,खून हमेसा ब्लड बैंक से ही ले जाँच ले , नए सुई का इस्तेमाल हर बार करें











Friday, July 24, 2009

जल संरक्षण







आज के समय मैं मे आवश्यकता है की हम अपने जीवन दाई जल को अमूल्य समझे



जल के बिना आप जीवन की कल्पना भी नही कर सकते क्योकि जल भोजन के पहले आता है और बाद मैं भी



आप यदि यह सोचते हैं की आप १२ रूपये खर्च करके मिनिरल वाटर की बोतल खरीद कर पि लेंगे यह आप का भ्रम



क्योकि जब धरती पर जल ही नही होगा मिनिरल वाटर कहाँ से आए गा



आज तनिक भी संभ्रांत में कमोडवाला शौचालय और नहाने के लिए बाथटब जरूर होता क्योकि यह एक मानक बन चुका है की आप अमीर हैं क्या वोह झुग्गी का रहने वाला नही नहाता है जो घंटो लाइन लगा कर दो या चार बाल्टी पानी लता है उसी में नहाना खाना कपड़े धोना सब कुछ करता आख़िर क्यों ?



क्योकि उसके हिस्से का पिने का पानी बाबूजी ने अपनी गाड़ी धोने में इस्तेमाल कर लिया कोठी की फर्श धो डाली



घर का स्वीमिंग पूल भर डाला क्योकि वोह भी उतना ही पैसा देते हैं जितना एक झुग्गी वाला देता है पुरा उपयोग करते है अपने पैसे का लेकिन क्या उन्होंने कभी सोचा की यह पानी सिमित मात्र में ही धरती में उपलब्ध है



आज जरुरत है हमें पानी बचने की आप लोगो से विनती है की ब्लॉग पर ज्वलंत संसाधन के दोहन पर प्रकास दल कर इनको बचाने की अपील करें






आप का अपना प्रकति प्रेमी



वायरस लवर ''बाबापंडित''