Friday, September 18, 2009

छटपटाहट (साभार -- शबनम शर्मा)

बच्चों का ड्राईंग का पीरियड था। आज मैंने कक्षा में उनसे ही कुछ सुनने की ठानी। कक्षा 2 के नन्हें विद्यार्थी, एकदम आईने की तरह साफ स्पष्ट। मैंने सवाल रखा। आज आप बताएँगे कि आपको क्या अच्छा नहीं लगता। किसी ने कहा पढ़ना, किसी ने कहा घिया की सब्जी तो किसी ने कहा सुबह स्कूल आना। नन्हा मनोज अपनी कुर्सी से उठकर मेरे पास आया और बोला, "मैम! मुझे पता क्या अच्छा नहीं लगता।" मैंने उसका गाल थपथपाते हुए पूछा, "हाँ, बोलो।" वह फफक-फफक कर रो पड़ा व बोला, "मेरी मम्मी ने मुझे बुआ के घर पढ़ने को रखा है और खुद 2-2 महीने नहीं आती। मुझे उनकी बहुत याद आती है। जब बुआ अपने बच्चों को अपने साथ सुलाती है, बाज़ार ले जाती है और फूफा जी उन्हें खिलौने दिलाते हैं, चूमते हैं और मुझे पढ़ने बिठा देते हैं। जब उनका बेटा कभी मेरी चीज़ें माँगता है तो छीनकर दे देते हैं।"




नन्हें से बालक के मुँह से उसकी व्यथा सुनकर मैं स्तब्ध रह गई कि कौन सी पढ़ाई कराने के लिए जीते जी ममता इतनी हलकी हो गई।

viruslover"Babapandit"

Wednesday, September 16, 2009

रिश्ते (शबनम शर्मा)

सामने वाले घर में राहुल की दादी की मृत्यु हो गई थी। राहुल की उम्र ५ वर्ष की है, नन्हा बालक हैरान सा सब कुछ देख रहा था। उसके पापा ने फोन उठाकर ढेरों फोन कर दिये। पापा बड़े व्यस्त नज़र आए। कुछ ही समय में घर लोगों से भर गया। वह सब कुछ एक कोने में खड़ा देखता रहा। दादी का दाह संस्कार होने के बाद नाश्ते-पानी के बाद सब उसके पापा को सांत्वना देने लगे। वो अपनी मासियों, मामों, ताई-चाची, बुआ सबसे मिलकर बतियाते रहे। ८-१० दिन तक कुछ मेहमान आए कुछ गये। तेहरवीं पर सब चले गये। राहुल के पापा आज उसके कमरे में आए। उन्हें राहुल का चेहरा बड़ा उतरा हुआ लगा। इतने दिनों से किसी ने उसकी सुध नहीं ली थी। नन्हा बालक पापा की गोद में बैठ गया।


“पापा अब दादी कब आएगी।” पापा ने कहा दादी दूर गई है बहुत दिनों में आएगी। फिर राहुल ने पूछा, “पापा जो हमारे घर दादी को देख-देखकर जोर-जोर से रो रहे थे और आपको चुप करा रहे थे, आप उन्हें मौसी, मामा, चाची, ताई, बुआ कह रहे थे, ये कौन-कौन होते हैं।” राहुल के पापा ने उसे सब रिश्तों का मतलब समझाया तो राहुल, पापा के गाल पर गाल सटाकर बोला, “पापा जब मैं मरूँगा तो कोई नहीं रोएगा मेरा तो कोई बहन-भाई भी नहीं है।” उसकी ये बात सुनकर राहुल के पापा ने उसे जोर से छाती से चिपटा लिया और कहा, “नहीं बेटा, नहीं ऐसा नहीं कहते।”

वायरस लवर ''बाबापंडित''

गोश्त की गंध (सुकेश साहनी ) साहित्य कुञ्ज से ली गयी

दरवाजा उसके बारह वर्षीय साले ने खोला और सहसा उसे अपने सामने देखकर वह ऐसे सिकुड़ गया जैसे उसके शरीर से एक मात्र नेकर भी खींच लिया गया हो। दरवाजे की ओट लेकर उसने अपने जीजा के भीतर आने के लिए रास्ता छोड़ दिया। वह अपने साले के इस उम्र में भी पिचके गालों और अस्थिपंजर-से शरीर को हैरानी से देखता रह गया।


भीतर जाते हुए उसकी नजर बदरंग दरवाजों और जगह-जगह से झड़ते प्लास्टर पर पड़ी और वह सोच में पड़ गया। अगले कमरे में पुराने जर्जर सोफे पर बैठे हुए उसे विचित्र अनुभूति हुई। उसे लगा बगल के कमरे के बीचोंबीच उसके सास -ससुर और पत्नी उसके अचानक आने से आतंकित होकर काँपते हुए कुछ फुसफुसा रहे हैं।

रसोई से स्टोव के जलने की आवाज आ रही थी। एकाएक ताजे गोश्त और खून की मिली जुली गंध उसके नथुनों में भर गई। वह उसे अपने मन का वहम समझता रहा पर जब सास ने खाना परोसा तो वह सन्न रह गया। सब्जी की प्लेटों में खून के बीच आदमी के गोश्त के बिल्कुल ताजा टुकड़े तैर रहे थे। बस, उसी क्षण उसकी समझ में सब कुछ आ गया। ससुर महोदय पूरी आस्तीन की कमीज पहनकर बैठे हुए थे, ताकि वह उनके हाथ से उतारे गए गोश्त रहित भाग को न देख सके। अपनी तरफ से उन्होंने शुरु से ही काफी होशियारी बरती थी। उन्होंने अपने गालों के भीतरी भाग से गोश्त उतरवाया था, पर ऐसा करने से गालों में पड़ गए गड्‌ढों को नहीं छिपा सके थे। सास भी बड़ी चालाकी से एक फटा-सा दुपट्टा ओढ़े बैठी थी ताकि कहाँ-कहाँ गोश्त उतारा गया है, समझ न सके। साला दीवार के सहारे सिर झुकाए उदास खड़ा था और अपनी ऊँची-ऊँची नेकर से झाँकती गोश्त रहित जाँघों को छिपाने का असफल प्रयास कर रहा था। उसकी पत्नी सब्जी की प्लेट में चम्मच चलाते हुए कुछ सोच रही थी।

“राकेश जी, लीजिए....लीजिए न!” अपने ससुर महोदय की आवाज उसके कानों में पड़ी।

“मैं आदमी का गोश्त नहीं खाता!!” प्लेट को परे धकेलते हुए उसने कहा। अपनी चोरी पकड़े जाने से उनके चेहरे सफेद पड़ गए थे।

“क्या हुआ आपको?....सब्जी तो शाही पनीर की है!”.....पत्नी ने विस्फारित नेत्रों से उसकी ओर देखते हुए कहा।

“बेटा, नाराज मत होओ....हम तुम्हारी खातिर में ज्यादा कुछ कर नहीं....” सास ने कहना चाहा।

“देखिए, मैं बिल्कुल नाराज नहीं हूँ।” उसने मुस्करा कर कहा, “मुझे दिल से अपना बेटा समझिए और अपना माँस परोसना बन्द कीजिए। जो खुद खाते हैं, वही खिलाइए। मैं खुशी-खुशी खा लूँगा।”

वे सब असमंजस की स्थिति में उसके सामने खड़े थे। तभी उसकी नजर अपने साले पर पड़ी । वह बहुत मीठी नजरों से सीधे उसकी ओर देख रहा था। सास-ससुर इस कदर अचंभित थे जैसे एकाएक किसी शेर ने उन्हें अपनी गिरफ़्त से आजाद कर दिया हो। पत्नी की आँखों से आँसू बह रहे थे। यह सब देखकर उसने सोचा....काश, ये गोश्त की गंध उसे बहुत पहले ही महसूस हो गई होती!

वायरस लवर ''बाबापंडित''

बूढ़े पिता का निश्तेज चेहरा

पिता को पत्र लिखे पंद्रह से भी अधिक दिन हो गए थे, किंतु अब तक उनका मनीऑर्डर नहीं आने से राजन पिता की इस सुस्ती पर मन-ही-मन कुढ़ रहा था।


“हुँह, कहते थे, बेटे तुम तनिक भी चिंता मत करना। चाहे जैसे भी हो, मैं तुम्हें पढ़ाऊँगा अवश्य ज़मीन-जायदाद बेचकर भी तुम्हारी पढ़ाई के लिए खर्च जुटाऊँगा। और हालत यह है कि, जेब खर्च के लिए भी पैसे भेजने में सिरदर्द कर रहे हैं।”

अन्यमनस्क-भाव से कमरे में ताला लगाकर जैसे ही वह मुड़ा सामने पोस्टमैन को देख उसकी बाँछें खिल गई। उसने झटपट मनीऑर्डर के रुपये लिये और प्रसन्नता से सीटी बजाता हुआ सड़क पर निकल आया।

मन-ही-मन उसने कार्यक्रम भी तय कर लिये। सबसे पहले तो ‘अनामिका‘ में भोजन करेगा। फिर शाम को दोस्तों के साथ रीजेन्ट चलेगा। संयोग से आज ही अमिताभ की फिल्म लगी है। ब्लैक में टिकट लेकर ही सही, लेकिन फिल्म वह आज ही देखेगा।

अचानक फुटपाथ पर एक कृशकाय मानव-आकृति को देखकर वह ठिठक गया। उसका पूरा शरीर हड्डियों का ढाँचा नजर आ रहा था। फुटपाथ पर बैठा वह बड़े जतन से ऊँगलियों पर हिसाब करता हुआ पैसे गिनने में व्यस्त था। किंतु राजन के पैरों के आहट मिलते ही वह सचेत हो गया और टकटकी लगाकर उसे ही देखने लगा। उससे आँखें मिलते ही राजन सिहर उठा। उसके पूरे शरीर में झुरझुरी-सी फैल गई।

उस दुर्बल आकृति से नजर फेरकर झटके से वह आगे बढ़ ही जाना चाहता था कि तभी उस व्यक्ति ने क्षीण स्वर में उसे आवाज़ लगायी- “बाबूजी..... बाबूजी.....।”

राजन प्रश्नवाचक दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए पूछ बैठा- “क्या है ?‘‘ “बाबूजी,’उसने दीनता से अपने मैले चिकट अंगोछे से मुड़ा-तुड़ा मनीऑर्डर फॉर्म निकाला और उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा- “बाबूजी, मेरा बेटा श्रीरामपुर में पढ़ता है, पिछले दिनों उसका पत्र आया है..... उसे पैसे की आवश्यकता है.... ये पैसे मैंने उसे भेजने के लिये जुगाड़ किये हैं.... जरा इस फारम को.....।”

आगे के शब्द को वह साफ-साफ नहीं सुन पाया। उसकी आँखों के आगे अपने बूढ़े पिता का निश्तेज चेहरा टंग गया था।





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वायरस लवर ''बाबापंडित''


एह कहानी साहित्य कुञ्ज से डॉ० यू० एस० आनन्द द्वारा लिखित है मैं उनका (लेखक) का धन्यवाद करता हूँ जो इस तरह के लड़को की आँखे खोल देने वाले साहित्य की रचना कर हैं