Wednesday, November 25, 2009

रिश्ते का नामकरण.................. दलीप सिंह वासन






उजाड़–से रेलवे स्टेशन पर अकेली बैठी लड़की को मैंने पूछा तो उसने बताया कि वह अध्यापिका बन कर आई है। रात को स्टेशन पर ही रहेगी। प्रात: वहीं से ड्यूटी पर उपस्थित होगी। मैं गाँव में अध्यापक लगा हुआ था। पहले घट चुकी एक–दो घटनाओं के बारे में मैंने उसे जानकारी दी।

‘‘आपका रात को यहाँ ठहरना उचित नहीं है। आप मेरे साथ चलें, मैं किसी के घर में आपके ठहरने का प्रबन्ध कर देता हूं।

जब हम गाँव में से गुज़र रहे थे तो मैंने इशारा कर बताया ‘‘मैं इस चौबारे में रहता हूँ।’’ अटैची ज़मीन पर रख वह बोली, ‘‘थोड़ी देर आपके कमरे में ही ठहर जाते हैं। मैं हाथ–मुँह धोकर कपड़े बदल लूँगी।’’

बिना किसी वार्तालाप के हम दोनों कमरे में आ गए।

‘‘आपके साथ और कौन रहता है?’’

‘‘मैं अकेला ही रहता हूं।’’

‘‘बिस्तर तो दो लगे हुए हैं!’’

‘‘कभी–कभी मेरी माँ आ जाती है।’’

गुसलखाने में जाकर उसने मुँह–हाथ धोए। वस्त्र बदले। इस दौरान मैं दो कप चाय बना लाया।

‘‘आपने रसोई भी रखी हुई है?’’

‘‘यहाँ कौन–सा होटल है!’’

‘‘फिर तो मैं खाना भी यहीं खाऊँगी।’’

बातों–बातों में रात बहुत गुज़र गई थी और वह माँ वाले बिस्तर पर लेट भी गई थी।

मैं सोने का बहुत प्रयास कर रहा था, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। मैं कई बार उठ कर उसकी चारपाई तक गया था। उस पर हैरान था। मुझ में मर्द जाग रहा था। परंतु उसमें बसी औरत गहरी नींद सोई थी।

मैं सीढि़याँ चढ़कर छत पा जाकर टहलने लग गया। कुछ देर बाद वह भी छत पर आ गई और चुपचाप टहलने लग गई।

‘‘जाओ सो जाओ, सुबह आपने ड्यूटी पर हाजि़री देनी है।’’ मैंने कहा।

‘‘आप सोए नहीं?’’

‘‘मैं बहुत देर तक सोया रहा हूँ।’’

‘‘झूठ।’’

‘‘.......’’

वह बिल्कुल मेरे सामने आ खड़ी हुई, ‘‘अगर मैं आपकी छोटी बहन होती तो आपको उनींदे नहीं रहना था।’’

‘‘नहीं–नहीं, ऐसी कोई बात नहीं,’’ और मैंने उसके सिर पर हाथ फेर दिया
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एक और डर का जन्म---------जिंदर


उस मरियल–से क्लर्क ने जेब से महीने–भर का वेतन निकाल चारपाई पर रखा और सिरहाने के नीचे से लेनदारों की लिस्ट निकाली। जोड़–घटाव करने के बाद उसके पास सिर्फ़ पचास रुपए बचे थे। पचास रुपए के आगे खड़े पूरे इकतीस दिन! कमरे में वह अकेला था, पर बच्चों की जरूरतों और पत्नी की हसरतों की लिस्ट फिल्म की रील की भाँति उसकी आँखों के आगे तेजी से घूमने लगी। पत्नी की लिस्ट पर लकीर मारते हुए उसे थोड़ी पीड़ा हुई, पर उसको इस बात का अहसास था कि ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ था। शशि की अधघिसी पैंट ने उसका हाथ पकड़ लिया। लेकिन पप्पी के टूटे हुए बूट ने एक ही झटके से उसका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। अभी वह कोई फैसला नहीं कर पाया था कि पत्नी अंदर आ गई और पचास का नोट उठाकर बोली, ‘‘मुझे नहीं पता, ये तो मैं नहीं दूँगी।’’


‘‘मेरी बात तो सुन!’’

‘‘बिल्कुल नहीं।’’ पत्नी उसी रौ में बोली।

‘‘सर्दियाँ शुरू हो गई हैं और पप्पी....’’

‘‘पप्पी के बूट से ज्यादा जरूरी आपकी दवाई है।’’

आगे वह कुछ नहीं बोला। उसने गले में से उठती खाँसी को जबरन रोक लिया। कहीं उसे खाँसते देख, पत्नी डॉक्टर को बुलाने ही न चली जाए।
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सूखे पेड़ की हरी शाख -------जगदीश कश्यप

रेट तय कर वह रिक्शे में बैठ गया और सोचने लगा–- बेटे का सामना कैसे कर पाएगा। वह तो आना ही नहीं चाहता था पर रतन की माँ बोली थी–- "देखो तुम एक बाप हो। बेटे ने शादी के लिए हामी भर दी । शादी करने यहीं आएगा। मान लो वहीं घर बसाकर वह हमें भूल जाए, तब हमारा क्या होगा? सरिता तो पराए घर की है । एक न एक दिन तो उसकी शादी करनी पड़ेगी। कब तक वह नौकरी कर हमें पालती रहेगी? पूरे सत्ताइस साल की हो चुकी है।"


"उतरो साहब,यही फाइन रेस्टोरेण्ट है।" --उसे झटका–सा लगा। रिक्शे से उतर वह न्यॉन साइन–बोर्ड पढ़ने लगा। पहले नीले अक्षर, फिर लाल। धुंधलके में लकदिप रोशनी में उसने देखा कि लोग शीशे वाला दरवाज़ा धकेल कर अन्दर जा रहे थे ,तो कोई–कोई बाहर निकल रहा था। अपने सादे लिबास और सिर पर बंधे साफ़े को देख एकबारगी उसे ख़ुद पर शर्मिदगी हुई। उसे अचानक याद आया। वह कड़कता हुआ बोला था–- "मैं एक मामूली बाबू, कहाँ तक भुगतूँ इस हरामज़ादे की बदनामी? सारा दिन आवारागर्दी और पार्टी पॉलिटिक्स । क्या मैंने इसलिए पढ़ाया था इसे! जी.पी. फण्ड में अब बचा ही क्या है? निचोड़ दिया है मुझे दोनों लड़कियों की शादियों ने।"

तभी वह कार के हॉर्न से चौंक गया और हड़बड़ाकर एक ओर हट गया। कार में से एक युवक उतरा और उसने आँखों से चश्मा उतारा। बूढ़े आदमी को सामने खड़ा पाकर युवक के चेहरे पर कुछ उभर–सा आया। रतन ने अपनी जो फोटू भेजी थी उससे यह युवक कितना मिलता–जुलता लगता है। उसे फिर याद आया। उस दिन तो हद हो गई थी। पता नहीं कौन से झगड़े में रतन कमीज–पैण्ट फड़वा आया था और चेहरे पर ख़रौंचे साफ दीख रही थीं।

"निकल जा...अभी निकल मेरे घर से ! ख़ानदान की नाक कटवा दी इसने!" और उसने ज़ोर से एक लात मारी थी....

"पिताजी आप यहाँ... क्या माँ ने भेजा है?"

वह भौचक्का रह गया। रतन बड़े अदब से पिता को रेस्टोरेण्ट के भीतर ले गया और अपने केबिन में ले जाकर रिवॉल्विंग चेयर पर बैठा दिया–- "आप आराम से बैठो, पिताजी। देखो, आपके नालायक बेटे ने कितनी तरक्की की है! आने में तकलीफ़ तो नहीं हुई? मैं थोड़ा बिजी था, वरना ख़ुद आता।"

पिता के दिल में आया कि वह अपने सपूत के आगे गिरकर जार–जार रो पड़े।
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Monday, November 16, 2009

धन्य है यह देश...... पी.सी.गोदियाल


बहुत साल पहले चिरंजन पार्क नै दिल्ली में एक आफिस कम गोदाम खोलने के लिए मकान देख रहे थे ! एजेंट एक बंगाली परिवार के घर में ले गया, घर वालो ने जिसमे एक ६०-६५ साल की विरध महिला भी थी माकन का पिछला हिस्सा दिखाया ! वहा जब एक कमरे में हम गए तो कोने पर एक वृद्ध लेटा था ! हमने कहा कि हमें अगले महीने की पहली तारीख से मकान चाहिए , मगर यहाँ ये विरध है इन्हें आप .. मेरी बात बीच में ही काटते हुए घर का बेटा बोला... वो हो जाएगा, पाप्पा को कैंसर है और डाक्टर ने कहा है कि दो हफ्ते से ज्यादा नहीं जी............. उसके बात सुन मै हक्का बक्का रह गया, और मेरे मुख से निकला धन्य है यह देश...... बेटा मकान किराये पर देने के लिए डाक्टर की भविष्यबाणी के सही निकलने की दुआ कर रहा था !

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Saturday, November 14, 2009

एक गरीब और बेचारी मा को देखिये कैसे बच्चे को जीना सिखाती है...



साभार     Prakash Singh "Arsh"                                                
  रोटी के लिए


बच्चे की जिद

और वो बेबस लाचार माँ

उसे मारती है,

वो जानती है भूख का दर्द

मार के दर्द में

कहीं खो जायेगा

कुछ देर को ही सही

बच्चा रोते रोते

सो जायेगा ॥

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