बस चलने तक किसी ने वहाँ बैठने की ज़िद न की। लेकिन जब बस चल पड़ी, तब कुछेक ने बैठने की ज़िद पकड़ ली।
बुज़ुर्ग का एक ही जवाब था कि ‘सवारी बैठी है।’ जब कोई पूछता कि सवारी कहाँ है, तो वह झोले की तरफ इशारा कर देता। असली बात का किसी को पता नहीं लग रहा था।
कुछ सवारियाँ अनाप–शनाप बोलने लगीं, बैठे हुए कुछ लोगों ने खाली सीट पर सवारी बैठाने की बुज़ुर्ग से विनती की। बुज़ुर्ग ने फिर वही शब्द ‘सवारी बैठी है’ दोहरा दिए।
बात बढ़ गई थी। सवारियों ने ज़बर्दस्ती बैठने की कोशिश की, पर बुजुर्ग ने उन्हें आराम से मना कर दिया। वह कहीं गहरे में डूबा था। हारकर सवारियों ने कंडक्टर को सारी बात बताई।
बुजुर्ग ने ढीले हाथों से जेब में से दो टिकट निकालकर कंडक्टर को पकड़ा दिए। आँसू पोंछते हुए उसने कहा, ‘‘दूसरा टिकट मेरे जीवन–साथी का है। वह अब इस दुनिया में नहीं रही। ये उसके फूल हैं......यह जीवनसाथी के साथ मेरा आखिरी सफर है।’’.....
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